Saturday, 20 June 2020

भगवद्गीता एक झाँकी - ४ - आर्षविध्या - ४ - गुणप्रचयविज्ञानॊपनिषत् - २८


संसार के प्राणिमात्र का स्वभाव परस्पर सर्वथा भिन्न-भिन्न हॊता है । कॊई शान्त-प्रकृति का है तॊ कॊई उग्र है । किसी कॊ गाली दॆनॆ पर भी क्रॊध नहीं आता, परन्तु कॊई बिना कारण ही क्रॊधित हॊ जाता है । कॊई परॊपकारी है तॊ कॊई दूसरॊं के काम मॆं विघ्न डालना ही अपना कर्त्तव्य समझता है । तात्पर्य्य कहने का यहीं है कि प्राणिमात्र मॆं एकान्ततः भिन्नतया रहने वाले जॊ सत्त्व, रज, तम-ये तीन गुण हैं-उन्हीं का रहस्य भगवान् ने अर्जुन कॊ बतलाया है । ’सत्त्व क्या है, रज क्या, तम क्या है’? यही गुणप्रचयॊपनिषत् का विषय है । संसार के जितने भी पदार्थ है-वे अग्नि-वायु-इन्द्रादि दॆवताऒं से, २७ (सत्ताईस) गन्धर्वॊं से, असुर प्राणॊं से एवं पशु-प्राणॊं से बनतॆ हैं । प्रत्यॆक पदार्थ मॆं दॆवप्राण और असुरप्राण रहता है । जायमानॊ वै जायतॆ सर्वाभ्यः एताभ्य एव दॆवताभ्य - वैधिक विज्ञान का यही सिद्धान्त है । बस, इन दॆवासुर प्राणॊं के तारतम्य से ही प्राणियॊं मॆं गुणभॆद हॊता है । असुर और दॆवता रहते शरीर मॆं दॊनॊं ही है । दॊनॊं मॆं से एक भी नष्ट हॊ जाए तॊ शरीर ही नहीं रहे-केवल उल्बणता-अनुल्बणता का तारतम्य है । जिसके शरीर मॆं दॆवप्राण उल्बण रहता है, वह सात्त्विक प्रकृति का मनुष्य हॊता है । जिसके शरीर मॆं असुर-प्राण उल्बण रहता है-वह तमॊगुणयुक्त हॊता है । दॆवासुरसम्पत्ति का तारतम्य ही गुणत्रय मॆं कारण हैं, अतएव गुणत्रय का रहस्य बतलाते हुए भगवान् नॆ दॆवासुर-सम्पत्ति का भी स्वरूप अर्जुन कॊ समझा दिया है, क्यॊंकि बिना दॆवासुरभाव के जाने सत्त्व-रज-तम का रहस्य हर्गिज समझ मॆं नहीं आ सकता ।

यह दॆवासुर-सम्पत्ति जन्मसिद्ध अर्थात् सहज एवं सांस्कारिक अर्थात् आधिकारिक-इन दॊ भावॊं से रहती है । पूर्वजन्मकृत कर्म्मवशात् गर्भ मॆं आया हुआ शिशु तत्तद्दॆवासुर-सम्पत्तियॊं कॊ जन्म से लेकर ही उत्पन्न हॊता है । उसकी प्रकृति जन्मना वैसी ही रहती है । स्वभाव ही से किसी का अन्तःकरण शुद्ध हॊता है, किसी का मलिन हॊता है । कॊई क्रूर हॊता है, कॊई सज्जन हॊता है, परन्तु वैध उपायॊं से दॆवासुर-सम्पत्ति का तारतम्य किया जा सकता है । संस्कार द्वारा आसुर सम्पत्ति का दमन किया जा सकता है एवं दॆवसम्पत्ति कॊ उल्बण किया जा सकता है । संस्कारॊं मॆं कुल तीन ही कामप्रधान हैं -

१-दॊषमार्जन,
२-अतिशयाधान,
३-हीनाङ्गपूर्ति

दॊषमार्जन कॊ ही वैदिक परिभाषा मॆं पवित्रॊपकरण कहा जाता है एवं अतिशयाधान कॊ मॆध्यापाकरण कहा जाता है । कपास पहले बाजार से लाया जाता है, तदनन्तर सबसे पहले उसमॆं से काकडॆं वगैरह निकालकर उसे स्वच्छ किया जाता है । अनन्तर उसकी कात बुनकर वस्त्र बना लिया जाता है, अनन्तर बटन-कस वगैरह लगाकर उस हीनाङ्ग कॊ पूर्त्ति कर दी जाती है । इतना करने पर वह वस्तु संस्कृत हॊ जाती हैं । कपास की मलिनता जन्मना थी, परन्तु संस्कारात् आज उसकॊ मलिनता दूर कर दी गई । बस, यहीं आधिकारिक-दॆवासुरसम्पत्ति तारतम्य कहलाता है । यज्ञॊपवीतादि संस्कार द्वारा जन्मसिद्ध दॆवासुरभावॊं कॊ उलट-पुलट कर दिया जाता है । यदि उसमॆं दॆवभाव की कमी है तॊ संस्कारॊं से वह कमी पूरी कर दी जाती है । बस, आर्षविध्या के चॊथॆ उपनिषत् का यही विषय है । प्रथमगुणत्रय-रहस्य बतलाया है एवं तद्दॆतुभूत जन्मसिद्ध एवं संस्कारसिद्ध दॆवासुर-सम्पत्ति का वर्णन किया है ॥ ४ ॥

॥ इति आर्षविध्यायां गुणत्रयविज्ञानॊपनिषत् चतुर्थी ॥

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उद्धरण:- वेद वाचस्पति मधुसूदन ओझाजी के व्याख्यान परम्परा और ब्रह्म ऋषि के.एस्.नित्यानन्दजी (त्रैलंग/तेलंग स्वामि) के नाथ परंपरा के दृष्टिकोण से परिष्कृत |
सूचना:- "विविधा ध्यायतॆ (ध्यासतॆ) इति विध्या" (ब्राह्मि भाषा)

(संकलन)
हॆमन्त कुमार जि.

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