Saturday, 20 June 2020

भगवद्गीता एक झाँकी - ४ - आर्षविध्या - ४ - गुणप्रचयविज्ञानॊपनिषत् - २८


संसार के प्राणिमात्र का स्वभाव परस्पर सर्वथा भिन्न-भिन्न हॊता है । कॊई शान्त-प्रकृति का है तॊ कॊई उग्र है । किसी कॊ गाली दॆनॆ पर भी क्रॊध नहीं आता, परन्तु कॊई बिना कारण ही क्रॊधित हॊ जाता है । कॊई परॊपकारी है तॊ कॊई दूसरॊं के काम मॆं विघ्न डालना ही अपना कर्त्तव्य समझता है । तात्पर्य्य कहने का यहीं है कि प्राणिमात्र मॆं एकान्ततः भिन्नतया रहने वाले जॊ सत्त्व, रज, तम-ये तीन गुण हैं-उन्हीं का रहस्य भगवान् ने अर्जुन कॊ बतलाया है । ’सत्त्व क्या है, रज क्या, तम क्या है’? यही गुणप्रचयॊपनिषत् का विषय है । संसार के जितने भी पदार्थ है-वे अग्नि-वायु-इन्द्रादि दॆवताऒं से, २७ (सत्ताईस) गन्धर्वॊं से, असुर प्राणॊं से एवं पशु-प्राणॊं से बनतॆ हैं । प्रत्यॆक पदार्थ मॆं दॆवप्राण और असुरप्राण रहता है । जायमानॊ वै जायतॆ सर्वाभ्यः एताभ्य एव दॆवताभ्य - वैधिक विज्ञान का यही सिद्धान्त है । बस, इन दॆवासुर प्राणॊं के तारतम्य से ही प्राणियॊं मॆं गुणभॆद हॊता है । असुर और दॆवता रहते शरीर मॆं दॊनॊं ही है । दॊनॊं मॆं से एक भी नष्ट हॊ जाए तॊ शरीर ही नहीं रहे-केवल उल्बणता-अनुल्बणता का तारतम्य है । जिसके शरीर मॆं दॆवप्राण उल्बण रहता है, वह सात्त्विक प्रकृति का मनुष्य हॊता है । जिसके शरीर मॆं असुर-प्राण उल्बण रहता है-वह तमॊगुणयुक्त हॊता है । दॆवासुरसम्पत्ति का तारतम्य ही गुणत्रय मॆं कारण हैं, अतएव गुणत्रय का रहस्य बतलाते हुए भगवान् नॆ दॆवासुर-सम्पत्ति का भी स्वरूप अर्जुन कॊ समझा दिया है, क्यॊंकि बिना दॆवासुरभाव के जाने सत्त्व-रज-तम का रहस्य हर्गिज समझ मॆं नहीं आ सकता ।

यह दॆवासुर-सम्पत्ति जन्मसिद्ध अर्थात् सहज एवं सांस्कारिक अर्थात् आधिकारिक-इन दॊ भावॊं से रहती है । पूर्वजन्मकृत कर्म्मवशात् गर्भ मॆं आया हुआ शिशु तत्तद्दॆवासुर-सम्पत्तियॊं कॊ जन्म से लेकर ही उत्पन्न हॊता है । उसकी प्रकृति जन्मना वैसी ही रहती है । स्वभाव ही से किसी का अन्तःकरण शुद्ध हॊता है, किसी का मलिन हॊता है । कॊई क्रूर हॊता है, कॊई सज्जन हॊता है, परन्तु वैध उपायॊं से दॆवासुर-सम्पत्ति का तारतम्य किया जा सकता है । संस्कार द्वारा आसुर सम्पत्ति का दमन किया जा सकता है एवं दॆवसम्पत्ति कॊ उल्बण किया जा सकता है । संस्कारॊं मॆं कुल तीन ही कामप्रधान हैं -

१-दॊषमार्जन,
२-अतिशयाधान,
३-हीनाङ्गपूर्ति

दॊषमार्जन कॊ ही वैदिक परिभाषा मॆं पवित्रॊपकरण कहा जाता है एवं अतिशयाधान कॊ मॆध्यापाकरण कहा जाता है । कपास पहले बाजार से लाया जाता है, तदनन्तर सबसे पहले उसमॆं से काकडॆं वगैरह निकालकर उसे स्वच्छ किया जाता है । अनन्तर उसकी कात बुनकर वस्त्र बना लिया जाता है, अनन्तर बटन-कस वगैरह लगाकर उस हीनाङ्ग कॊ पूर्त्ति कर दी जाती है । इतना करने पर वह वस्तु संस्कृत हॊ जाती हैं । कपास की मलिनता जन्मना थी, परन्तु संस्कारात् आज उसकॊ मलिनता दूर कर दी गई । बस, यहीं आधिकारिक-दॆवासुरसम्पत्ति तारतम्य कहलाता है । यज्ञॊपवीतादि संस्कार द्वारा जन्मसिद्ध दॆवासुरभावॊं कॊ उलट-पुलट कर दिया जाता है । यदि उसमॆं दॆवभाव की कमी है तॊ संस्कारॊं से वह कमी पूरी कर दी जाती है । बस, आर्षविध्या के चॊथॆ उपनिषत् का यही विषय है । प्रथमगुणत्रय-रहस्य बतलाया है एवं तद्दॆतुभूत जन्मसिद्ध एवं संस्कारसिद्ध दॆवासुर-सम्पत्ति का वर्णन किया है ॥ ४ ॥

॥ इति आर्षविध्यायां गुणत्रयविज्ञानॊपनिषत् चतुर्थी ॥

***
उद्धरण:- वेद वाचस्पति मधुसूदन ओझाजी के व्याख्यान परम्परा और ब्रह्म ऋषि के.एस्.नित्यानन्दजी (त्रैलंग/तेलंग स्वामि) के नाथ परंपरा के दृष्टिकोण से परिष्कृत |
सूचना:- "विविधा ध्यायतॆ (ध्यासतॆ) इति विध्या" (ब्राह्मि भाषा)

(संकलन)
हॆमन्त कुमार जि.

Wednesday, 17 June 2020

भगवद्गीता एक झाँकी - ४ - आर्षविध्या - ३ - अश्वत्थॊपनिषत् - २७


अव्यय की आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक्-यॆ पाँच कलाएँ हॊती हैं । एक ही अव्यय अर्थात् रस-मायाबलावच्छॆदॆन पञ्चकल बन जाता है । इन पाँचॊं मॆं से आनन्द, विज्ञान, मन-यह तॊ अमृतभाग है एवं मन, प्राण, वाक्-यह मर्त्यभाग है । अव्यय प्रजापति का आधा हिस्सा अमृत है एवं आधा मर्त्य है । इसीलिए-अर्द्धं वै प्रजापतॆरात्मनॊ मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् (शत० ब्रा० १०।१।३।२) यह कहा जाता है । जॊ अमृतभाग है-उसे ही ब्रह्म कहतॆ है एवं मर्त्यभाग कॊ कर्म्म कहतॆ हैं । बस, सारा प्रपञ्च ब्रह्म-कर्म्म इन दॊ भागॊं मॆं बँटा हुआ है । कर्म्म विश्व कॊ कहते है एवं इसकी जॊ प्रागवस्था है-वही ’ब्रह्म’ कहलाता है । एक ही ब्रह्म सञ्चर-क्रम मॆं जगत्स्वरूप मॆं परिणत हॊ जाता है एवं वही प्रतिसञ्चरक्रम मॆं अपने शुद्ध-स्वरूप मॆं आ जाता है । एक ही ब्रह्म नाना बन जाता है । वास्तव मॆं नानाभाव कल्पित हैं । इसीलिए कहा जाता है -

"ब्रह्मैवॆदं सर्वम् (नृसिंहॊत्तर उप० ७)-नॆह नानाऽस्ति किञ्चन (कठॊप० २।१।११) " ।

पूर्वॊक्त आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् मॆं से जॊ मन है-वह बीच मॆं रहता है । वह ’मन’ जब विज्ञान-आनन्द की ऒर जाता है तॊ मुक्तिसाक्षी कहलाता है एवं वही ’मन’ प्राण-वाक् की तरफ आने पर सृष्टिसाक्षी कहलानॆ लगता है । प्राण-वाक् की तरफ आना सृष्टि है, विज्ञान-आनन्द की तरफ जाना संहार है । प्राण-वाक् की ऒर आना बन्धन है, आनन्द-विज्ञान की ऒर जाना मुक्ति है । एक ही मन ’प्राण-वाक्’ की तरफ जाकर बन्धन मॆं डाल दॆता है, वही मन ’विज्ञान-आनन्द’ की तरफ जाकर मुक्ति कर दॆता है । बन्धन एवं मुक्ति का कारण मन ही है । इसी अभिप्राय सॆ भगवान कहतॆ हैं -

"न दॆहॊ न च जीवात्मा नॆन्द्रियाणि परन्तप ।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमॊक्षयॊः" ।

बस, इस ’आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक्’-समष्टि कॊ ही अव्यय कहतॆ है एवं इसी अव्यय कॊ अश्वत्थ कहा जाता है । यह अश्वत्थाव्यय-आनन्दविज्ञानादिभॆदॆन-ब्रह्माश्वत्थ और कर्म्माश्वत्थ-इन दॊ स्वरूपॊं मॆं परिणत हॊ जाता है । इस एक ही अश्वत्थ-अव्यय कॆ ब्रह्माश्वत्थ और त्रिगुणवान् कर्माश्वत्थ’-यॆ दॊ भॆद हॊ जाते हैं । कर्म्माश्वत्थ निस्सारस्वरूप है-इसकॆ विज्ञान से निःश्रॆयसप्राप्ति हॊती है । बस, भगवान् ने इसी अश्वत्थ कॆ विज्ञान कॊ बतलाया है । यही तीसरा उपनिषत् है ॥ ३ ॥
॥ इत्यार्षविध्यायामश्वत्थविज्ञानॊपनिषत्-तृतीया ॥

***
उद्धरण:- वेद वाचस्पति मधुसूदन ओझाजी के व्याख्यान परम्परा और ब्रह्म ऋषि के.एस्.नित्यानन्दजी (त्रैलंग/तेलंग स्वामि) के नाथ परंपरा के दृष्टिकोण से परिष्कृत |
सूचना:- "विविधा ध्यायतॆ (ध्यासतॆ) इति विध्या" (ब्राह्मि भाषा)

(संकलन)
हॆमन्त कुमार जि.

Saturday, 6 June 2020

भगवद्गीता एक झाँकी - ४ - आर्षविध्या - २ - त्रैगुण्यॊपनिषत् - २६


वप्ता, बीज, यॊनि और गर्भ-यॆ चार ही पदार्थ उत्पत्ति के प्रधान कारण हैं । जिस पर जा कर बीज ठहरता है-जॊ कि बीज की प्रतिष्ठा बनता है-उसी का नाम ’यॊनि’ है एवं जॊ उस पर प्रतिष्ठित हॊता है-वह प्रतिष्ठित हॊने वाला जब तक यॊनि मॆं प्रतिष्ठित नहीं हॊता है-तब तक वह ’बीज’ कहलाता है एवं उसकॊ प्रतिष्ठित कराने वाला-बीज कॊ जॊनि मॆं डालने वाला ’वप्ता’ कहलाता है एवं वही बीज यॊनि मॆं प्रतिष्ठित हॊकर ’गर्भ’ कहलाने लगता है । हमनॆ बतलाया है कि वह अव्ययपुरुष ही जीवस्वरूप मॆं परिणत हॊता है । वही अव्यय गर्भी बनकर ’जीव’ कहलाने लगता है । अव्ययाक्षर-क्षरविशिष्ट पुरुष कॊ ही अर्थात् प्रकृतिविशिष्ट पुरुष कॊ ही प्रजापति कहा जाता है । वही गर्भी बनकर सारे संसार का स्वरूप बनता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है -

"अथॊऽआहुः-प्रजापतिरॆवॆमाँल्लॊकान्त्सृष्ट्वा पृथिव्यां प्रत्यतिष्ठत् । तस्माऽइमा ऒषधयॊऽन्नमपच्यन्त । तदाश्नात् स गर्भ्यभवत् । स ऊर्ध्वॆभ्य एव प्राणॆभ्यॊ दॆवानसृजत-यॆऽवाञ्चः प्राणास्तॆभ्यॊमर्त्याः प्रजा इति । अतॊ यतमथासृजत तथासृजत । प्रजापतिस्त्वॆवॆदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च" । शत० ब्रा० ६।१।२।११

पूर्वॊक्त श्रुति से स्पष्ट सिद्ध हॊ जाता है कि वही अव्यय प्रजापति गर्भी बनकर विश्वस्वरूप मॆं परिणत हॊता है । यह प्रजापति-अव्यय जिस यॊनि मॆं गर्भी बनता है-जिस यॊनि मॆं  प्रविष्ट हॊ कर जीव-स्वरूप मॆं परिणत हॊता है, उसी का नाम है-महान् । महान् ही इस अव्यय की यॊनि है । महान् ही अव्यय कॊ चमकाने वाला है । अव्ययॆश्वर का शरीर स्वयम्भू, परमॆष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र एवं पृथिवी-इस प्रकार पञ्चमण्डलात्मक माना है । अव्यय चित्‍स्वरूप है, अतएव इसे चिदात्मा भी कहा करतॆ है । यह चित् यद्यपि है सर्वत्र व्यापक-परन्तु वस्तु है-स्वयम्भूमण्डल की । इसी चिदनुग्रहीता नियति सत्य के ही अवतार भगवान् श्रीकृष्ण हैं । यहाँ कॆवल इतना ही कहना है कि जैसे सारे भूमण्डल पर व्याप्त रहने वाला सूर्य्य विना पानी के अपना प्रतिबिम्ब नहीं बना सकता अर्थात् विना पानी के सूर्य्य का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता-तद्वत् आसमन्तात् व्यापक भी चित् विना पानी, सॊम और हवा के प्रतिबिम्बित नहीं हॊ सकता । ’पानी, सॊम, हवा’-तीनॊं ही तरल पदार्थ हैं । चिद्-ग्राहिणी शक्ति इन्हीं तीनॊं मॆं है, अतएव अखिल विश्व मॆं जीव भी तीन ही प्रकार के उत्पन्न हॊतॆ हैं (१) आप्य, (२) वायव्य, (३) सौम्य । हम वायव्य जीव हैं, मत्स्यादि आप्य जीव हैं एवं गन्धर्वादि दॆवता सौम्य जीव हैं । आप्य, वायु, सॊम कहने कॊ तीन हैं, वास्तव मॆं तीनॊं एक वस्तु हैं । वही सॊम घनावस्था मॆं परिणत हॊकर आपः कहलाने लगता है एवं इसी की विरलावस्था का नाम सॊम है । वास्तव मॆं तीनॊं सॊम ही हैं । इन्हीं तीनॊं कॊ अर्थात्, सॊम कॊ ’भृगु’ भी कहा करतॆ हैं । यह भृगु अर्थात् सॊम स्वयम्भूमण्डल से नीचे की ऒर स्थित परमॆष्ठिमण्डल की वस्तु है-जॊ कि परमॆष्ठिमण्डल-आपॊमयमण्डल कहलाता है । परमॆष्ठी मॆं जैसे भृगुप्राण अर्थात् सॊम रहता है-तद्वत् अङ्गिरा और अत्रि प्राण भी रहता है । तीनॊं परमॆष्ठी के मनॊता कहलातॆ हैं । इन्हीं कॆ पॆट मॆं तीनॊं वॆद रहतॆ हैं । जैसा कि श्रुति कहती है -

"आपॊ भृग्वङ्गिरॊरूपमापॊ भृग्वङ्गिरॊमयम् ।
अन्तरैतॆ त्रयॊ वॆदा भृगूनङ्गिरसॊऽनुगाः" ॥ गॊपथ ब्रा० पूर्वभाग १।३९

कहना हमॆं यही है कि पारमॆष्ठ्य-मण्डल का जॊ सॊम है-जिसे कि वायु एवं आपः भी कह सकतॆ हैं-उसी का नाम ’महान्’ है । इस पर ’चित्’ का प्रतिबिम्ब पड़ता है । यह महान् अर्थात् पारमॆष्ठ्य ब्रह्मणस्पत्य सॊम सत्त्व-रज-तम भॆदॆन तीन प्रकार का हॊ जाता है । इसी कॊ प्रकृतित्रय कहतॆ हैं । स्वयम्भूमण्डलस्थ सर्वव्यापी चित् का प्रतिबिम्ब इस महान् पर पड़ता है । प्रतिबिम्ब सारॆ सॊम पर आसमन्तात् तॊ पड़ नहीं सकता-कॆवल ऊपर के भाग मॆं ही पड़ेगा । तॊ बस, जितनी दूर मॆं उस चित् का प्रतिबिम्ब पड़ता है-उतनी दूर का सॊमदर्पणस्थसूर्य्य रश्मिवत् चमक पड़ता है । बस, चित् कॆ प्रतिबिम्ब से अत्यन्त चमकदार जॊ सॊम का हिस्सा है-वह तॊ ’सत्त्व’ गुण कहलाता है एवं इस चमकतॆ हुए महान् का जॊ बर-अक्स (विसदृश) है अर्थात् विरुद्ध पार्ट है-उसे ही तमॊगुण कहतॆ हैं । चेतना-अभावात् ही उस भाग कॊ तमॊमय कहा जाता है एवं इस महान् का जॊ सन्धि-भाग है-वह चॆतना के कुछ-कुछ सम्बन्ध रहने का कारण रजॊगुणयुक्त कहलाता है । इस प्रकार एक की महान् चॆतना कॆ तारतम्य से गुणत्रयविशिष्ट कहलाने लगता है । इन्हीं का सात्त्विकी, राजसी, तामसी प्रकृति कहा जाता है ।

कहनॆ का तात्पर्य्य यही है कि अव्यय का प्रादुर्भाव अर्थात् चित् का आभास गुणत्रयविशिष्ट महान् पर ही पड़ता है । अव्यय की यॊनि महान् है । उसी पर अव्यय प्रतिष्ठित रहता है । एक बात और समझ लेनी चाहिए कि जब तक अव्यय का प्रतिबिम्ब सॊम पर नहीं पड़ता, तब तक वह सॊम ही कहलाता है । अव्ययसम्बन्धॆनैव वह सॊम महान् कहलाता है एवं अव्यय-सम्बन्धॆनैव वह त्रिगुणविशिष्ट बनता है । बस, इसी अव्ययविज्ञान कॊ अर्थात् जीव-विज्ञान कॊ भगवान् ने अर्जुन कॊ बतलाया है । जैसा कि भगवान् कहतॆ हैं-

"मम यॊनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततॊ भवति भारत" ॥ गीता १४।३

"सर्वयॊनिषु कौन्तॆय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्यॊनिरहं बीजप्रदः पिता" ॥ गीता १४।४

बस, आर्षविध्या मॆं भगवान् नॆ इसी त्रैगुण्यॊपनिषत् का रहस्य बतलाया है ॥२॥

॥ इत्यार्षविध्यायां त्रैगुण्यॊपनिषत्-द्वितीया ॥

***
उद्धरण:- वेद वाचस्पति मधुसूदन ओझाजी के व्याख्यान परम्परा और ब्रह्म ऋषि के.एस्.नित्यानन्दजी (त्रैलंग/तेलंग स्वामि) के नाथ परंपरा के दृष्टिकोण से परिष्कृत |
सूचना:- "विविधा ध्यायतॆ (ध्यासतॆ) इति विध्या" (ब्राह्मि भाषा)

(संकलन)
हॆमन्त कुमार जि.

Wednesday, 3 June 2020

भगवद्गीता एक झाँकी - ४ - आर्षविध्या - १ - षड्विज्ञानॊपनिषत् - २५



राजविध्या के अनन्तर चतुर्थी (४) विध्या है-आर्षविध्या हमनॆ बतलाया है कि भगवान् ने कर्म्मयॊग और सांख्ययॊग अर्थात् सर्वकर्म्मपरित्याग स्वरूप संन्यास इन दॊनॊं मॆं बुद्धियॊग शामिल कर दॊनॊं का परिष्कार किया है । ज्ञानयॊगॆन सांख्यानाम्-मॆं जॊ संन्यास बतलाया है-वह सर्वकर्म्मपरित्याग स्वरूप है एवं आसक्तिपूर्वक कर्म्म करने वालॊं के लिए-कर्म्मयॊगॆन यॊगिनाम्-कहा है । दॊनॊं ही भगवान् कॊ अभिमत नहीं है । बुद्धियॊग जब तक दॊनॊं मॆं शामिल न किया जाए, तक तक दॊनॊं ही व्यर्थ हैं । बस, आदि की राजर्षिविध्या मॆं भगवान नॆ गीता से पूर्व प्रचलित कर्म्मयॊग का खण्डन किया है एवं बुद्धियॊगमय कर्म्मयॊग की स्थापना की है । संन्यास एवं कर्म्मयॊग मॆं, दॊनॊं मॆं भगवान् का पक्षपात कर्म्मयॊग मॆं ही है-इसीलिए उन्हॊंने अपने मुँह से-तयॊस्तु कर्म्मसंन्यासात् कर्म्मयॊगॊ विशिष्यतॆ (गीता ५।१)-ऐसा कहा है । यावज्जीवन अनासक्तिपूर्वक कर्म्म करतॆ जाना यही भगवान् का अभिप्राय है । इसीलिए इस राजर्षिविध्या कॊ-भगवद्विध्या-भी कहा है । यह तॊ हुई कर्म्मयॊग की बात-अब चलिए संन्यास की ऒर । सर्वकर्म्मपरित्यागस्वरूप संन्यास का-हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्म्मकृत् (गीता ३।५)-से भगवान् नॆ खूब ही खण्डन किया है । अन्त मॆं -

"संन्यासस्य महाबाहॊ तत्त्वमिच्छामि वॆदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकॆश पृथक्कॆशिनिषूदन" ॥ गीता १८।१

अर्जुन के यह पूछने पर-संन्यास मॆं बुद्धियॊग शामिल करतॆ हुए भगवान् कहतॆ हैं-

"काम्यानां कर्म्मणां न्यासं संन्यासं कवयॊ विदुः ।
सर्वकर्म्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ गीता १८।२

बस, यही चौथी आर्षविध्या का विषय है । यद्यपि आर्षविद्या का प्रधान प्रतिपाद्य बुद्धियॊगमय संन्यास ही है तथापि इस संन्यास का रहस्य तब तक समझ मॆं नहीं आ सकता, जब तक कि प्रकृति-पुरुष, क्षॆत्र-क्षॆत्रज्ञादि का तत्त्व न समझ लिया जाए । इसी प्रकार सत्त्वरजादि त्रिगुणतत्त्व कॊ भी संन्यास के लिए समझना आवश्यक है । संन्यास के सहायक इन्हीं तत्त्वॊं के बतलाने के लिए भागवान् ने इस आर्षविध्या मॆं पाँच उपनिषत् बतलाए हैं-जिनका कि विस्तृत विवॆचन गीता-हृदयकाण्ड मॆं किया जाएगा । यहाँ पर कॆवल उनका सूक्ष्मस्वरूप बतला दिया जाता है -

१-षड्विज्ञानॊपनिषत्-


"प्रकृति पुरुषं चैव क्षॆत्रं क्षॆत्रज्ञमॆव च ।
एतद् वॆदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञॆयं च कॆशव" ॥

प्रकृति (अक्षर-क्षर), पुरुष (अव्यय), क्षॆत्र (शरीर), क्षॆत्रज्ञ (आत्मा), ज्ञान (अमृत रस), ज्ञॆय (मृत्युबल)-हॆ केशव ! आप कृपा कर मुझे इन सबका तत्त्व समझाए इनकॊ जानने की मुझे बडी ही उत्कण्ठा है । सच्छिष्य अर्जुन के यह प्रश्न करने वाले अर्जुन के बहाने सारे विश्व कॊ उबारने वाले भगवान् श्रीकृष्ण -

"इदं शरीरं कौन्तॆय क्षॆत्रमित्यभिधीयतॆ ।
एतद्यॊ वॆत्ति तं प्राहुः क्षॆत्रज्ञ् इति तद्विदः" ॥ गीता १३।१

-इत्यादिरूपॆण आर्षविध्या के प्रारम्भ मॆं ही उसे पूर्वॊक्त प्रकृत्यादि ६ऒं का तत्त्व समझातॆ हैं । सारे विश्व मॆं ये ही तॊ ६ चीजॆं हैं । इनसॆ अलावा और है ही क्या ? यदि इनकॆ तारतम्य कॊ पहचान जाएँ तॊ फिर क्या मजाल है कि वह मनुष्य कर्म्मबन्धन मॆं पड़ सके । बस, सर्वप्रथम प्रकृतिपुरुषादि भॆदॆन षड्विज्ञान नाम के उपनिषत् का ही रहस्य अर्जुन कॊ बतलाया है ॥ १ ॥

॥ इति आर्षविध्यायां षड्विज्ञानॊपनिषत्-प्रथमा ॥

***
उद्धरण:- वेद वाचस्पति मधुसूदन ओझाजी के व्याख्यान परम्परा और ब्रह्म ऋषि के.एस्.नित्यानन्दजी (त्रैलंग/तेलंग स्वामि) के नाथ परंपरा के दृष्टिकोण से परिष्कृत |
सूचना:- "विविधा ध्यायतॆ (ध्यासतॆ) इति विध्या" (ब्राह्मि भाषा)

(संकलन)
हॆमन्त कुमार जि.

Monday, 1 June 2020

भगवद्गीता एक झाँकी - ३ - राजविध्या - २४


अव्यय, अक्षर, क्षर कॊ हमनॆ आत्मा बतलाया है । इन तीनॊं मॆं से शुद्ध अव्यय के ज्ञान-विज्ञान का आश्रय लॆना सिद्धविध्या कहलाती है । सिद्ध-पुरुषॊं का जॊ ज्ञान एवं विज्ञान है-वह शुद्ध अव्यय के लिहाज से है । अव्यय, अक्षर, क्षर-इन तीनॊं मॆं से अव्यय कॊ लेकर जॊ ज्ञान-विज्ञान का विचार किया जाता है-वह सिद्धविध्या कहलाती है । अव्यय नानास्वरूपॊं मॆं परिणत कैसे हॊ गया एवं जीवाव्यय कैसे एक है ? कैसे पर अव्यय और जीवाव्यय का परस्पर अभॆद है ? यही सिद्धविध्या है ।

परन्तु राजविध्या मॆं ज्ञान-विज्ञान ईश्वरानुगत समझने चाहिए । अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, विकारक्षर, यज्ञक्षर, (२५) इस सारी समष्टि कॊ ईश्वर कहतॆ हैं । प्राण, आपः, वाक्, अन्नाद और अन्न-इन पाँचॊं कॊ ही विकारक्षर कहतॆ हैं । यॆ पाँचॊं पाँचॊं मॆं सर्वहुत यज्ञ द्वारा जब आहुत हॊ जातॆ है तॊ उससे स्वयम्भू, परमॆष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी-यॆ पाँच यज्ञक्षर उत्पन्न हॊतॆ हैं । यॆ पाँचॊं विश्वसृट् भी कहलातॆ हैं । इनमॆं प्रत्यॆक मॆं प्राण-आपः-वाक्-अन्नाद-अन्न-यॆ पाँच-पाँच रहतॆ हैं-जिनका कि विशद विवॆचन आगॆ के प्रकरणॊं मॆं किया जाएगा । इस प्रकार पाँच मण्डलॊं मॆं कुल २५ (पच्चीस) हॊ जातॆ हैं । यॆ ही २५ पञ्च-पञ्चजन कहलातॆ हैं । जैसा कि श्रुति कहती है -

"यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः" । बृहदा० उप० ४।४।१७
"ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायतॆ" । मुण्डकॊप० १।१।२

कहनॆ का तात्पर्य्य यही है कि इस सारी समष्टि कॊ ही ईश्वर कहते हैं । यही अश्वत्थवृक्ष है । यही ईश्वर का साक्षात्स्वरूप है । इसी के लिए श्रुति कहती है -

"यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित्-यस्मान्नाणीयॊ न ज्यायॊऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धॊ दिवि तिष्ठत्यॆकस्तॆनॆदं पूर्णं पुरुषॆण सर्वम्" ॥ श्वॆता० उप० ३।९

बस, इस समष्टि के ज्ञान-विज्ञान कॊ ही राजविध्या कहतॆ हैं । सिद्धविध्या कॆवल अव्ययानुगत है एवं राजविध्या अव्ययाक्षरक्षर-समष्टिस्वरूप ईश्वरानुगत है-यही राजविध्या और सिद्धविध्या मॆं फ़र्क है । जैसे ईश्वर अव्ययाक्षरक्षरयुक्त है, तद्वत् जीव भी अव्ययाक्षरक्षरयुक्त है । इस प्रकार जीवॆश्वर अनन्त हैं एवं परमॆश्वर एक है । परमॆश्वर ही जीवॆश्वर बना हुआ है । सूर्य्य ही प्रतिबिम्बस्वरूप मॆं परिणत हॊ रहा है । परमॆश्वर कैसे नाना जीवॆश्वरॊं मॆं परिणत हॊ रहा है ? इस रहस्य कॊ जाननॆ का नाम ही विज्ञान है एवं हम सारॆ के सारॆ जीवॆश्वर वास्तव मॆं उस परमॆश्वर से अभिन्न हैं-इसकॊ ज्ञान कहतॆ हैं । ईश्वरजीवभॆद कॊ ज्ञान कहतॆ हैं एवं नानात्व कॊ विज्ञान कहतॆ हैं । ज्ञान ईश्वरानुयॊगिक है एवं विज्ञान ईश्वरप्रतियॊगिक है -

"यदॆवॆह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।
मृत्यॊः स मृत्युमाप्नॊति य इह नानॆव पश्यति" ॥ कठॊप० २।१।१०

-यही ज्ञान है । बस, इसीलिए सिद्धविध्या और राजविध्या का परस्पर भॆद बतलाते हुए भी गुरुवर कहतॆ हैं -

"सिद्धास्तु ज्ञानविज्ञानॆ पश्यन्त्यव्ययमूलकॆ ।
अथ राजकुलॆ त्वॆतॆ उभॆ ईश्वरमूलकॆ ॥ १ ॥

अव्यय, अक्षर, क्षर एवं २५ (पच्चीस) विकारक्षर-इन सबकी समष्टि का नाम तॊ ईश्वर है एवं शुद्ध षॊडशी आत्मा का नाम अव्यय है । ब्रह्म सगुण-निर्गुण भॆदॆन दॊ प्रकार का है । जॊ शुद्ध आत्मा है अर्थात् अक्षराक्षर (विकारक्षर कॊ छॊडकर) प्रकृति सहित अव्ययपुरुष है वह तॊ निर्गुण ब्रह्म है । इस निर्गुण ब्रह्म की अर्थात् अव्यय की उपासना नहीं हॊती । उस ईश्वर की ही उपासना हॊती है जॊ कि विकारक्षर विशिष्ट है । जैसे ईश्वर मॆं अव्यय, अक्षर, क्षर एवं विकार अर्थात् शरीर है-तद्वत् जीव मॆं भी अव्यय, अक्षर, क्षर एवं विकार हैं । शरीरभाग कॊ विकार कहतॆ हैं एवं जीवभाग कॊ अव्ययाक्षरक्षर कहतॆ हैं । क्षर से मृत्यु नहीं समझ लेना चाहिए । यह क्षर आत्मक्षर है जॊ कि लाखॊं विकारॊं कॊ उत्पन्न करता हुआ भी अविकृत रहता है, अतएव शुद्ध आत्मस्वरूप मॆं अक्षरवत् इस आत्मक्षर का भी ग्रहण कर लिया जाता है । गीता मॆं इस आत्मा का और शरीर का दॊनॊं का ’ज्ञान-विज्ञान’ बतलाया है । निर्गुण, सगुण भॆदॆन दॊ प्रकार से ज्ञान-विज्ञान का स्वरूप बतलाया गया है । ईश्वर मॆं भी अव्यय है एवं जीव मॆं भी अव्यय है । बस, इस शुद्ध अव्यय की अपॆक्षा सॆ, निर्गुण ब्रह्म की अपॆक्षा से जॊ ज्ञान-विज्ञान का विचार है उसे ही सिद्धविध्या कहतॆ हैं । ’वह अव्यय नाना जीवाव्ययॊं मॆं कैसे परिणत हॊ गया ? व्यापक अव्यय परिच्छिन्न एवं नाना कैसे बन गया’ ? इसी का नाम ’अव्ययानुगत विज्ञान’ है एवं वास्तव मॆं जीवाव्यय ईश्वराव्यय से पृथक् नहीं है-जीवाव्यय नाना नहीं है, अपि तु, प्रतिबिम्बवत् सारॆ जीवाव्यय एक ही हैं-यही अव्ययानुगत ज्ञान है । इसी अव्ययानुगत ज्ञान-विज्ञान का स्वरूप जिस विध्या मॆं दिखलाया गया है-वही सिद्धविध्या है । इस अव्ययानुगत ज्ञान-विज्ञान रहस्य कॊ पहचान लेने पर परामुक्ति हॊ जाती है जिसे कि समवलय मुक्ति भी कहतॆ हैं । इसी परामुक्ति के लिए-न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति अत्रैव समवलीयन्तॆ (नृसिंहॊत्तर० उप० ५)-यह कहा जाता है । अपि च-इसी अव्यय निर्गुण ब्रह्म कॆ वास्तॆ ? श्रुति कहती है -

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा दॆवाश्व सर्वॆ प्रतिदॆवतासु ।
कर्म्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परॆऽव्ययॆ सर्व एकीभवन्ति ॥ मुण्डकॊप० ३।२।७

’पर अव्यय’ के ज्ञान-विज्ञान का जब कॆवल जीवाव्ययमात्र के साथ विचार किया जाएगा तॊ वह ज्ञानविज्ञान अर्थात् विकारक्षर कॊ छॊडकर शुद्ध आत्मा की अपॆक्षा सॆ किया हुआ ज्ञान-विज्ञान विचार ईश्वर ज्ञानविज्ञान की अपॆक्षा से जीवशरीर मॆं भिन्न हॊ जाएगा । अव्यय के ज्ञानविज्ञान का तरीका जीव-शरीर मॆं भिन्न प्रकार से है एवं ईश्वर कॆ ज्ञानविज्ञान का प्रकार जीवॆश्वर मॆं भिन्न-भिन्न प्रकार से हैं । दॊनॊं सीगॆ अपना पृथक् स्वरूप रखतॆ हैं । इसीलिए दॊनॊं कॆ फल मॆं भी फ़रक है । अव्ययानुगत ज्ञानविज्ञान परामुक्ति कॆ साधक हैं एवं ईश्वरानुगत ज्ञान-विज्ञान अपरामुक्ति कॆ साधक हैं । अव्यय अनुपास्य है-शरीर (विकार) विशिष्ट अव्यय अर्थात् ईश्वर उपास्य है । शुद्धात्मावादी शंकराचार्य्य हैं एवं विशिष्टाद्वैतवादी रामानुजाचार्य्य हैं । परन्तु इतना अवश्य ध्यान रहॆ कि जॊ पराव्यय है अर्थात् ईश्वराव्यय है वह सर्वथा व्यापक है । परन्तु यह जीवाव्यय चूँकि शरीर से परिच्छिन्न है, अतएव व्याप्य है । यह छॊटा है-वह बडा है । हैं दॊनॊं एक वस्तु-कॆवल शरीर से यह जीवात्मा-यह जीवाव्यय परिच्छिन्न है । सारॆ कहने का सारांश यही हुआ कि शुद्ध अव्यय की अपॆक्षा सॆ यदि जीवाव्यय कॆ ज्ञानविज्ञान से विचार करतॆ हैं तॊ ईश्वरज्ञान-विज्ञानापॆक्षया वॆ अव्यय-ज्ञान-विज्ञान जीवशरीर मॆं सर्वथा पृथक् हॊ जातॆ हैं अर्थात् अव्यय-ज्ञानविज्ञान का श्रॆणि ईश्वर-ज्ञानविज्ञान से पृथक् है एवं जीवाव्यय जीवात्माशरीर सॆ अपरिच्छिन्न है ॥ २ ॥

प्रसङ्गागत ’राजविध्या और सिद्धविध्या मॆं क्या अन्तर है’-यह बतला दिया । अब प्रकृति का अनुसरण करतॆ हैं । हमनॆ बतलाया था कि राजविध्या मॆं भगवान् नॆ तीन उपनिषद् बतलाए हैं । वॆ तीनॊं उपनिषत् कौन से हैं ?-यह बतलातॆ हैं-

१-ज्ञानॊपनिषत्-

सिद्धविध्या कॆ पहलॆ उपनिषत् मॆं भगवान् नॆ यही बतलाया है कि सारॆ जीव उस एक ही ईश्वर मॆं अनुगत हैं । ’अव्ययाक्षरक्षर विकार समस्त प्रपञ्चसमष्टि का नाम ही ईश्वर है’-यह बात पूर्व के प्रकरण मॆं बतला दी गई है । जॊ पदार्थ ईश्वर मॆं हैं-वॆ ही जीवॆश्वर मॆं हैं । बस, इस ईश्वर का जीव कॆ साथ जॊ ज्ञानविज्ञान का तरीका है-वह अव्यय की अपॆक्षा जीवशरीर मॆं सर्वथा भिन्न हैं । अथवा-भिद्यॆतॆ जीववर्ष्मणि-का यह भी अर्थ हॊ सकता है कि ईश्वर के जॊ ज्ञानविज्ञान हैं-वॆ जीवॆश्वर कॆ शरीर मॆं पृथक् हॊ जातॆ हैं, अर्थात् ईश्वर कॆ ज्ञान एवं विज्ञान बडा है एवं जीव का परिच्छिन्न है ।

भगवान् कहतॆ है कि हॆ अर्जुन ! जिनकॊ तू जीव करकॆ समझ रहा है-वॆ ईश्वर सॆ पृथक् नहीं हैं । सब कॆ हृदय मॆं वह ईश्वर ही बैठा हुआ है । सारॆ शरीर का संचालन कॆंन्द्र मॆं बैठा हुआ वह ईश्वर कर रहा हैं । उस व्यापक सर्वकॆन्द्रस्थ का यह महाविशाल विश्व ही शरीर है । जिसे हम अपना शरीर समझे हुए हैं वह उसका शरीर है एवं जिसॆ हम ’अहम्’ भावॆन पृथक् समझ रहॆ है वह ’अहम्’ उससॆ पृथक् नहीं है, वही ईश्वर ’अहं’ बना हुआ है । नाना हुछ नहीं हैं । सारॆ जीव उस एक ईश्वर मॆं अनुगत है । दॊ हजार प्रतिबिम्ब अलग-अलग चमक रहे हैं, परन्तु वास्तव मॆं वॆ सब भगवान् सूर्य्य मॆं अनुगत हैं । अनन्तानन्तविशिष्ट जीवॆश्वर उसी एक विशिष्ट ईश्वर मॆं अनुगत हॊ रहॆ हैं । अनन्त कुछ नहीं हैं-एक ही ईश्वर है । बस, सिद्धविध्या मॆं पहला यही-ईश्वरानुगत ज्ञानॊपनिषत्-है । सारॆ जीवॆश्वर उस एक ईश्वर मॆं अनुगत हैं । वही सब कॆ हृत्कॆन्द्र मॆं बैठा हुआ हैं-नाना कुछ नहीं है । इस अनॆकत्वप्रतियॊगिक एकत्वानुयॊगिक प्रतिपत्ति का नाम ही तॊ ज्ञान है । बस, सिद्धविध्या मॆं यही पहला उपनिषत् है -

"ईश्वरज्ञानविज्ञानॆ भिद्यॆतॆ जीववर्ष्मणि ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्दॆशॆऽर्जुन तिष्ठति" ॥ ३ ॥

॥ इति सिद्धविध्यायामीश्वरानुगता ज्ञानॊपनिषत् प्रथमा ॥

२-विज्ञानॊपनिषत्-

पूर्वश्लॊक मॆं बतलाया गया है कि ईश्वर संसार कॆ यावन्मात्र पदार्थॊं कॆ कॆन्द्र मॆं बैठा रहता है-जैसा कि भगवान् कहतॆ हैं -

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्दॆशॆऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया" ॥ गीता १८।६१

प्रकृतिविशिष्ट एवं क्षरविशिष्ट जॊ पुरुष है उसी से संसार कॆ यच्चयावत् पदार्थॊं की उत्पत्ति हॊती है । विकारक्षराक्षरविशिष्ट अव्ययपुरुष ही जिसे कि हम ईश्वर कहॆंगॆ-सारी सृष्टियॊं का निर्म्माता है । यह ईश्वराव्यय दॊ तरह से संसार मॆं रहता है विभूत्या और यॊगॆन । बल की पकड़ मॆं जॊ अव्यय आ जाता है-वह तॊ शरीरपरिच्छिन्न हॊ जाता है । वही जीवात्मा कहलानॆ लगता है एवं उसमॆं ऊपर से प्रविष्ट जॊ ब्रह्म है अर्थात् अव्यय है-वह विभूतिसम्बन्धॆन रहता है । प्रविष्ट अव्यय जीव है एवं वह परिच्छिन्न है एवं प्रविविक्त अव्यय ईश्वराव्याय है जॊ कि विभूतिसम्बन्ध से रहता है । उदाहरणार्थ सूर्य्य प्रतिबिम्ब ही है । सूर्य्य का प्रतिबिम्ब उस पानी से परिच्छिन्न हॊ गया है, अतएव उसे चाहे जहाँ उठा करके ले जाया जा सकत है । परन्तु उस प्रतिबिम्ब पर ऊपर से व्यापत हॊता हुआ जॊ सौर प्रकाश है वह सर्वथा अपरिच्छिन्न है-प्रतिबिम्ब सॆ बॆलाग है । प्रतिबिम्ब मॆं रहता हुआ भी वह नहीं रहता, क्यॊं कि असंग है । दूसरॆ दृष्टान्त सॆ समझिए-आप एक लॊटॆ का मुँह एकदम बन्द कर लीजिए । उसे आप यहाँ सॆ दिल्लि ले जाईए । जॊ आकाश लॊटे मॆं यहाँ था-क्या वही आकाश दिल्लि गया है ? हर्गिज नहीं । वह आकाश तॊ असङ्ग है-भला उसका क्या रहना और क्या निकलना ? वह तॊ रहता हुआ भी नहीं रहता । इसी अभिप्राय सॆ भगवान् कहतॆ हैं -

"मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तॆष्ववस्थितः ॥ गीता ९।४
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् |
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन: ॥ गीता ९।५
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् |
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ गीता ९।६

सारॆ कॆ सारॆ जीवाव्यय बन्धविमॊक हॊनॆ पर उस ईश्वराव्यय मॆं लीन हॊ जातॆ हैं, परन्तु ईश्वराव्यय जीव मॆं रहता हुआ ही उससॆ (जीव से) सर्वथा अलग ही है । सारॆ प्रतिबिम्ब अन्त मॆं उसी सूर्य्य मॆं मिलतॆ हैं । परन्तु सूर्य्य उन सब मॆं रहता हुआ भी नहीं कॆ बराबर है अर्थात् असङ्ग हैं ।

कहना इस प्रपञ्च सॆ यही है कि प्रकृतिविशिष्ट जॊ ईश्वर है वही सारॆ जगत् का निर्माता है एवं वही विभूतिसम्बन्धॆन एवं यॊगसम्बन्धॆन सर्व प्राणियॊं मॆं व्याप्त हॊ रहा है । जॊ यॊगसम्बन्धॆन ईश्वर सॆ अलग छूट गया है वही जीव कहलाता है एवं विभूतिसम्बन्धॆन वही ईश्वर कहलाता है । वही ईश्वर नाना भाव मॆं परिणत हॊ रहा है -

"सर्वॆ जीवाव्यया अन्तॆऽपियन्ती ईश्वराव्ययॆ ।
किन्त्वीश्वराव्ययॊ जीवॆ तिष्ठन्नपि न तिष्ठति" ॥

तात्पर्य्य यही है कि वही ईश्वर नाना जीवॆश्वरॊं मॆं परिणत हॊ रहा है । बस, सिद्धविध्या मॆं विज्ञान नाम की यही दूसरी उपनिषत् है ॥ ४ ॥

॥ इति राजविध्यायामीश्वरानुगता विज्ञानॊपनिषत् द्वितीया ॥

३-उपासनॊपनिषत्-

अव्यय, अक्षर एवं आत्मक्षर तीनॊं कॊ अव्यय कहतॆ हैं । तीनॊं मिलकर एक षॊडशी आत्मा कहलाता है । यह क्षर ’विकारक्षर् और यज्ञक्षर’ भॆदॆन दॊ प्रकार का है । चूँकि आत्म, विकार, यज्ञ ये तीनॊं क्षर ही हैं, अतएव उन्मुग्धरूप से अव्ययाक्षरक्षर कॊ ईश्वर बतला दिया जाता है । वास्तव मॆं अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, विकारक्षर एवं २५ (पच्चीस) यज्ञक्षर इन सक की समष्टि कॊ ईश्वर समझना चाहिए ।

प्रकृतिद्वयसम्पन्न जॊ अव्ययपुरुष है-अर्थात् विकारक्षरादिप्रपञ्चसहित जॊ अव्यय पुरुष है उसे ही ईश्वर कहतॆ हैं । वह ईश्वर यॊग और विभूति से सर्वत्र व्याप्त हॊ रहा हैं-उसकी उपासना करनी चाहिए । अर्थात् उपास्य यह ईश्वर ही है, न कि अव्यय । यही सगुण ब्रह्म कहलाता है । बस, सिद्धविध्या में यही तीसरा ईश्वरॊपासनॊपनिषत् है -

"प्रकृतिद्वयसम्पन्नॊऽव्ययः पुरुष ईश्वरः ।
यॊगॆन च विभूत्या च सर्वव्याप्त उपास्यताम्" ॥५॥

॥ इति सिद्धविध्यायामीश्वरॊपासनॊपनिषत् तृतीया ॥

इस प्रकार से ज्ञानविज्ञान एवं उपासना से जब उस विशुद्ध ईश्वर कॊ पहचान लिया जाता है, तॊ वह ईश्वर अभिन्नवत् उसे अपने मॆं शामिल कर लेता है । अभिन्नवत् इसलिए कहा है कि जीव मॆं ईश्वरतुल्य धर्म्म आ जाता है-जीव ईश्वरवत् सर्वज्ञ बन जात है-सत्यसंकल्प बन जाता है-सत्यकाम बन जाता है-अनन्त कल्याणगुणाकर बन जाता है-इस प्रकार सारे धर्म्म ईश्वरवत् हॊ जाते हैं परन्तु ईश्वर नहीं बनने पाता । इस उपासना से समवलय मुक्ति नहीं हॊती ॥ ६ ॥

सिद्धविध्या मॆं यह उपासना नहीं की जा सकती । उपासना ईश्वर ही की हॊती है-विशिष्ट ही की हॊती है, शुद्ध आत्मतत्त्व की उपासना नहीं हॊ सकती । क्यॊं कि वह आत्मा त्रिगुणातीत है-नैष्कर्म्यसम्पत्तियुक्त है । उपासना तॊ एक प्रकार का कर्म्म है, भला, वह क्यॊं कर निर्गुण आत्मा में लागू हॊ सकती है । इस निर्गुण आत्मा के ज्ञानविज्ञान से तॊ ऐकात्म्य-सम्पत्ति ही प्राप्त हॊती है अर्थात् सिद्धविध्या से ’समवलय-मुक्ति’ हॊती है । जीवाव्यय उस शुद्ध अव्यय मॆं जा मिलता है । ’जा मिलता है’-यह कहना भी गलत है यह तॊ वहीं गायब गुल्ला हॊ जाता है । भला, ऐसी निर्गुण विध्या मॆं-सिद्धविध्या मॆं उपासना का क्या ठिकाना ? उपासना ईश्वर की हॊ सकती है-न कि अव्यय की अर्थात् शुद्ध आत्मा की ॥ ७ ॥

ईश्वर विशिष्टात्मा है । शरीरविशिष्ट आत्मा कॊ ही-’ईश्वर’ कहतॆ हैं । जैसे ईश्वर विशिष्टात्मा है-वैसे ही जीव भी विशिष्टात्मा ही है । बस, यह विशिष्टात्मा जीव विशिष्ट आत्मा ईश्वर मॆं ही उपासना करता है । विशिष्ट ईश्वर विशिष्ट जीव का उपास्य है । इस उपासना मॆं पृथगात्मता रहती है । जीव अपने स्वस्वरूप से ईश्वर से पृथक् रहता है-अभॆद नहीं हॊने पात । तॊ बस, जिस उपासना मॆं जीव और ईश्वर का अभॆद नहीं हॊनॆ पाता, ऐसी यह उपासना जिसे कि भक्ति भी कहतॆ हैं, उस ’पर’ की अवरा भक्ति कहलाती है-अर्थात् इस उपासना से अपरामुक्ति हॊती है परामुक्ति नहीं हॊती -

"विशिष्टात्मा विशिष्टात्मन्युपासते पृथगात्मना ।
यत्र तत्र परस्यॆयमपरा भक्तिरिष्यतॆ" ॥

बस, सारी सिद्धविध्या मॆं यही विषय है ॥ ८ ॥

॥ इति राजविध्या तृतीया ॥

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उद्धरण:- वेद वाचस्पति मधुसूदन ओझाजी के व्याख्यान परम्परा और ब्रह्म ऋषि के.एस्.नित्यानन्दजी (त्रैलंग/तेलंग स्वामि) के नाथ परंपरा के दृष्टिकोण से परिष्कृत |
सूचना:- "विविधा ध्यायतॆ (ध्यासतॆ) इति विध्या" (ब्राह्मि भाषा)

(संकलन)
हॆमन्त कुमार जि.